पंडित का क्या धर्म जो पंडालों तक में वीआईपी दर्शन का पात्र तय करे___
पांडित्य पर .....
अथाह तापस चतुर्वेदी
पाखंड के पांडित्य पर प्रहार से उन्हें बुरा लगता है जिन्हें ब्रह्म का ज्ञान नहीं। सारे वेद-पुराण और धर्म शास्त्र अंततः इस एक वाक्य को उद्धृत करते हैं कि मैं और तुम अलग-अलग नहीं, हम सब ब्रह्म हैं। ईश्वर बाहर नहीं अंदर हैं।
श्रद्धा देखकर उपजे तो श्रद्धा नहीं अनुकरण है। आजकल यह देखकर ही उपजती है जबकि हिन्दू धर्म इकलौता है जगत में जो अपना ब्रह्म (अर्थात ईश्वर) चुनने का विकल्प देता है यद्यपि ब्रह्मा, विष्णु, महेश एक हैं। आप चाहें जिसे पूज लें!
आप चाहें तो नदी का पत्थर उठाकर शिवलिंग बना लें, हिन्दू धर्म को आपत्ति नहीं, किसी पंडित से पूछने की अनिवार्यता नहीं। जिन मूर्तियों की पूजा-प्रतिष्ठा की जाती है, उन्हें किस जाति के मूर्तिकार ने बनाया है, यह वेद की ऋचाएँ आपसे कभी नहीं पूछती। आपने देखा होगा, अनेक मूर्तियों में उनके मूर्तिकार का नाम भी लिखा होता है। आप फूल चढ़ाएँ, पूजा करें, आरती उतारें, कुछ न कुछ उनको भी अर्पण होता है। कल को मूर्तिकार अपने को भगवान मान ले तब!
ब्राह्मण और पंडित में फ़र्क़ यह है कि हर ब्राह्मण पंडित नहीं होता। पंडित वह जो स्वयं को दान कर दे धर्म के लिए, ईश्वर के विधान को बनाए रखने के लिए। ईश्वर ने तो पशु को भी पूजने कहा है! वह पंडित कैसा जो स्वयं तो माँस न खाए पर पूजन में बलि को सिद्धी बताए।
वह पंडित कैसा जो धर्म पर दान को प्राथमिकता दे। उस पंडित का क्या धर्म जो पंडालों तक में वीआईपी दर्शन का पात्र तय करे।
कृष्णजी और सुदामा की कथा को उसके मूल में पढ़ें, भगवान से भक्त का मेल समझ आ जाएगा। ड्राई-फ़्रूट का पैकेट आप घर ले जाते हैं पंडितजी, लालची सारे ब्राह्मणों को कहा जाता है। सुदामा ने भी गुरुमाता के वचन को नकार कर अकेले चने खाए थे!!!
वेदज्ञान को विज्ञान से जोड़ें, भय और भेदभाव से नहीं।